Saturday, December 21, 2013

चंद कमरों का था ये मकां,आपने इसको घर कर दिया ----(अजय की गठरी )

                   (६९ )
सुबह मिलना था पर आपने,आज फिर दोपहर कर दिया |
चंद कमरों का था ये मकां,आपने इसको घर कर दिया ||

हुस्न से अपने थी बेखबर 
जब जवानी की आहट हुई
खुशबू ऐसी बदन से उठी 
शहर को बाखबर कर दिया ||

उनके गर्दन से लिपटा था जो  
एक झोंके से लहरा गया 
वो दुपट्टा उन्होंने तो बस 
यूँ इधर का उधर कर दिया ||

कल मिलेंगे यहीं इस समय 
कह के जाने लगे जब वो घर |
उसने बाहों में भर के उन्हें 
गीला गीला अधर कर दिया ||

देखो कितना वफादार है 
दुम हिलाये करे कूँ कूँ कूँ |
एक शादी ने इंसान को 
पालतू जानवर कर दिया ||

बिन तुम्हारे मैं ढोता रहा 
जिन्दगी का ये मुश्किल सफ़र |
साथ जब तुम मेरे आ गए 
कितना आसां सफर कर दिया ||

सिर्फ फांसी है उनकी सजा 
पैसा जिनके लिए है खुदा |
इन हवाओं में घोला जहर 
थालियों में जहर भर दिया ||

राह दिखलाते हैं अब हमें 
दलाल ,बेईमान ,तस्कर ,डकैत |
खादी में जादुई है असर 
लुच्चों को मान्यवर कर दिया ||
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 गठरी पर अजय कुमार
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7 comments:

वाणी गीत said...

रोमांटिक शायरी आखिर के शे'रों में व्यंग्य , रोष में तब्दील हुई।

Kuldeep Thakur said...

आप की ये सुंदर रचना आने वाले सौमवार यानी 23/12/2013 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है... आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है...
सूचनार्थ।


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राजीव कुमार झा said...

बहुत सुन्दर .
नई पोस्ट : मृत्यु के बाद ?

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

कमाल का रूमानी गीत है... इसे पढ़ते हुये बस गुंगुनाने को जी चाह रहा है!!

Reena Maurya said...

बहुत खूब गजल .....
हर शेर बेहतरीन ...
वाह ...
:-)

Digamber Naswa said...

रोमानी अंदाज़ ले लिखा ... सच के करीब जाता गीत ...

Onkar said...

सुन्दर ग़ज़ल