Sunday, October 4, 2009

प्रेम-डगर

है ये लंबा सफर ,चलना है उम्र भर |
हंसके रस्ता कटे ,प्यार की बात कर ||
लोग मतलब की अब बात करने लगे |
लोग अपने पड़ोसी से डरने लगे ||
ऐसा माहौल हमको बनाना है अब |
खुशियाँ जाने न पायें शहर छोड़ कर ||
कृष्ण , ईशा ने , नानक ने , इक बात की |
सबने सम्मान की , हर इक जात की ||
सबके तालीम में , एक ही बात थी |
रास्ते हैं कई , एक मंजिल मगर ||
जब गुनहगार बस एक इंसान हो |
सारा मजहब ही क्यों उसका बदनाम हो ?
मत बनाओ , ऐसे इबादत के घर |
जो बन जाते हैं , सियासत के घर ||

5 comments:

समयचक्र - महेंद्र मिश्र said...

है ये लंबा सफर ,चलना है उम्र भर |
हंसके रस्ता कटे ,प्यार की बात कर ||

बढ़िया रचना . धन्यवाद

नीरज गोस्वामी said...

Bahut achchhi rachna...Badhaaii

Neeraj

संजय भास्कर said...

बहुत खूब .जाने क्या क्या कह डाला इन चंद पंक्तियों में

shyam1950 said...

sabse kam comments wali post dhoondhni padti hai bat karne ke liye aapki rachnon par charcha kaise karein shyad e-mail hi vikalp ho aapka lekhan achha hai saf suthra aur nikhra hua abhi adhik posts nahi dekhi

shyam1950 said...

sabse kam comments wali post dhoondhni padti hai bat karne ke liye aapki rachnon par charcha kaise karein shyad e-mail hi vikalp ho aapka lekhan achha hai saf suthra aur nikhra hua abhi adhik posts nahi dekhi