Thursday, January 7, 2010

गये साल का तराना

तुमको कुछ बात बताना था
इस दिल का हाल सुनाना था
क्या क्या गुजरी बतलाना था
तुम चले गये तुम्हे जाना था ।

कभी सफल रहे , कभी विफल रहे
कभी दहल गये , कभी अटल रहे
क्या क्या झेला बतलाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था

खेतों में हरियाली होगी
अब देश में खुशहाली होगी
यूं ही दिल को बहलाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था

दिखता नही विकास कैसा
निकला और चला गया पैसा
जिस जेब में उसको जाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था

बहुतों को मिला थोड़ा थोड़ा
फंस गया अकेला मधु कोड़ा
इसका पर्दा सरकाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था

क्यों जिंदा हैं अफजल , कसाब
कब होगा जख्मों का हिसाब
उन घावों को सहलाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था

कुछ खट्टी सी कुछ मीठी सी
कुछ कड़वी सी कुछ तीखी सी
जीवन का स्वाद चखाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था

51 comments:

पी.सी.गोदियाल said...

बहुतो को मिला थोड़ा थोड़ा
फंसा सिर्फ एक मधुकोड़ा
इसका पर्दा सरकाना था
ऐ साल तुम गए , तुम्हे जाना था
बहुत खूब अजय जी !

भंगार said...

तुम्हे जाना था तुम चले गये .....वाह यह लिखने

का नया फार्मेट अच्छा लगा ....बस लिखते रहें ,नया अंदाज

तो मिलता है ....

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत बढ़िया रचना अजय जी ..धन्यवाद

alok said...

nice one to give salute to 2009 ""tumeh jana tha tum chale gaye" and fansh gaya madhu koda"

wish u very very happy new year.

rgds
alok srivastava
nokia

शोभना चौरे said...

bahut shi aaklan purane sal ka .
खेतों में हरियाली होगी
अब देश में खुशहाली होगी
यूं ही दिल को बहलाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था

fir bhi ashavan hai .

मनोज कुमार said...

दिखता नही विकास कैसा
निकला और चला गया पैसा
जिस जेब में उसको जाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था
कविता का प्रवाह बहुत अच्छा है। संदेश और प्रेरणा देती रचना पढ़ कर मन को ही नहीं दिल को भी सुकून मिला।

arun c roy said...

ajay ji beete saal ke liye bahut badhiya nazm... naya andaj... naya kalewar... naya tarika... hasya ke saath gambhirta ka put.. achha laga ... shubhkaamna !

alka sarwat said...

मैं काफी दिनों से गठरी देखने की सोच रही थी पर सफल नहीं हो पा रही थी ,आज पहुँच ही गयी मैं गठरी के पास ,अगर आप मनोरंजन चैनल से जुड़े हैं तो कभी कपिलवस्तु महोत्सव को भी कवर करें
ये बहुत अच्छी रचना लिखी है आपने
अजमल कसाब वाले पैरे का तो जवाब नहीं

दिगम्बर नासवा said...

क्यों जिंदा हैं अफजल , कसाब
कब होगा जख्मों का हिसाब
उन घावों को सहलाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था ..

सच कहा .........बहुत से सवाल छोड़ गया है बीता साल ........ शायद आने वाला साल इन सब के जवाब दे सके ........ अच्छी रचना है ..........

डॉ टी एस दराल said...

निकला और चला गया पैसा
जिस जेब में उसको जाना था ।

बहुतों को मिला थोड़ा थोड़ा
फंस गया अकेला मधु कोड़ा

बहुत सही कहा , अजय कुमार जी।
शानदार रचना।

उम्दा सोच said...

अजय जी गए साल का तराना इस साल के तराने के अलफ़ाज़ न बने ये कामना है !
सटीक सुंदर लेख , पंक्ति से पंक्ति जुडती सी !!!

बढ़िया रचना,बहुत खूब,शानदार

निर्मला कपिला said...

दिखता नही विकास कैसा
निकला और चला गया पैसा
जिस जेब में उसको जाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था
वाह और मधु कोडा कसाब इन के बारे मे भी बहुत सटीक अभिव्यक्ति है बधाई इस रचना के लिये और नये साल की भी शुभकामनायें

sangeeta swarup said...

बहुत सुन्दर......अच्छा कटाक्ष है......सोते हुओं को जगती रचना...बधाई

Raj said...

Ajay sahab
"...क्यों जिंदा हैं अफजल , कसाब
कब होगा जख्मों का हिसाब ..." bahut sahi farmaya.

Apki kavita sangraha bahut hee achha hai. Tippani ke liye bhi tnx...Keep smiling :)

हास्यफुहार said...

रचना
अच्छी
मन की भावना
सच्ची।

satyendra said...

nice poetry.

परमजीत बाली said...

बहुत बढ़िया रचना है।बधाइ।

दिखता नही विकास कैसा
निकला और चला गया पैसा
जिस जेब में उसको जाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था

रजनीश said...

सही कहा आपने, सबने मिलकर मधु पिया पर कोड़ा बरसा सिर्फ मधु कोड़ा पर ।

pushpa said...

very nice.
Thank you!

Surya said...

प्रिय अजय जी,

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद जो कि आप मेरे ब्लॉग पे आगमन किये...मैं अभी MCA कि तैयारी कर रहा हूँ कानपुर में तो समय कि अति कमी होने के कारण ज्यादा ब्लॉग नहीं पढ़ पा रहा हूँ बस कभी कभी मित्र लोग कविता दे देते हैं तो उन्हें ब्लॉग पर पोस्ट कर देता हूँ...हिंदी से अति लगाव है...जब समय होगा तो हिंदी के लिए कुछ करने का इरादा है...और वो कुछ बड़ा ही होगा...

धन्यवाद...

Gaurhav H Atri said...

Bahut Khoob !
Apko Nav-varsh ki Shubhkamnayen.

Dr.Ajeet said...

अपनी बात आपके अन्दाज मे सुन करके अच्छा लगा..
.

शेष फिर

डा.अजीत

www.shesh-fir.blogspot.com

Amit said...

ब्लॉग पर सुध1र कर लिया गया है..:-)धन्यवाद ...
आप के काम और आपके एकाकार होने का प्रमाण देती येे कविता..अच्छी कविता.

lokendra singh rajput said...

achhi rachna ke liye dhanyawaad......

dr vikastomar said...

bahaut accha ajay g bahaut hi accha

Babli said...

आपको और आपके परिवार को नए साल की हार्दिक शुभकामनायें!
बहुत बढ़िया रचना लिखा है आपने!

Manju Gupta said...

मित्रता की गठरी में भरी दी हैं नव वर्ष की असीम खुशियाँ ,प्रगति -उन्नति की सौगाते .बधाई .
लेखन मे दम है .

Murari Pareek said...

बहुतों को मिला थोड़ा थोड़ा
फंस गया अकेला मधु कोड़ा
इसका पर्दा सरकाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था

वाह भाई आपकी ये पढ़ते हुए जो आनंद आया की मत पूछो!!! एक ले और ताल में पढ़ा !!!

मो सम कौन ? said...

अजय जी, मेरे ब्लग पर पधारने का, सुझाव देने का बहुत-बहुत शुक्रिया। तकनीकी मामलों में भी अनुभवहीन होने के कारण अभी बहुत कुछ सीखना है, आशा है सहयोग मिलता रहेगा। धन्यवाद।

santara said...

gaye saal ka tarana.
aapko bhi tha yun gana.
bahut achchhe ajay bhai,
aap khoob naam kamana..

sada said...

क्यों जिंदा हैं अफजल , कसाब
कब होगा जख्मों का हिसाब
उन घावों को सहलाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था ..

बहुत ही सुन्‍दर रचना, बधाई ।

P.S.Bhakuni ( Paanu ) said...

TUM CHALE GAYE ,TUMHEN JANA THA ?PATA HAI, PHIR BHI JANE KA DARD.COMMENT KARNA BHI EK PROCESS HAI,VERNA COMMMENTS KARANA ASAAN NAHI HAI ,AAPKI RACHNAON PR,
'LIKHA THA NASEEB MAI HONA, PADOSI KISI SAHANSHAH KA .....'MERE LIYE TOH ITNA HI KAFI HAI KI AAPKI RACHNAYEN PADNE KO MIL RAHI HAIN... SAMAY KAHAN SE CHURATE HO SIR ?

कमलेश वर्मा said...

दिखता नही विकास कैसा
निकला और चला गया पैसा
जिस जेब में उसको जाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था..बहुत बढ़िया;;

संजय भास्कर said...

बहुत सही कहा , अजय कुमार जी।
शानदार रचना।

Tej Pratap Singh said...

क्यों जिंदा हैं अफजल , कसाब
कब होगा जख्मों का हिसाब
उन घावों को सहलाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था

nice

Tej Pratap Singh said...

क्यों जिंदा हैं अफजल , कसाब
कब होगा जख्मों का हिसाब
उन घावों को सहलाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था

nice

Amit kumar said...

acha likha ajay ji....

डा.आलोक दयाराम,एम.ए.,आयुर्वेद रत्न,DIHom(London) said...

अजयजी, आपकी निम्न पंक्तियां भारत के आम नेताओं का हिसाब किताब उजागर करती हैं-
बहुतों को मिला थोडा थोडा,
फ़ंस गया अकेला मधुकोडा।
बढिया रचना के लिये बधाई!आभार।

deepti said...

aapkii shubhkamnao ke liye dhanyawad..rachna acchi likhi hai appne

Harshkant tripathi"Pawan" said...

bahut khub. shandar tukbandi............

Ulook said...

इनको चलने की बीमारी हो गयी है
चले जाते हैं हमेशा !

विश्व दीपक said...

अच्छी रचना।

बधाई स्वीकारें।

-विश्व दीपक

Mrs. Asha Joglekar said...

तुम चले गये तुम्हे जाना था
हम को कितना कुछ सुनाना था ।
इस बहाने देश की राजनीतिक आर्थिक नेतिक स्थिती का खूब जा़यजा़ लिया है ।

आमीन said...

खूब

Neeraj Singh said...

काश की गुजरे साल में हम जो न कर पाए.. वो सब हो जाए ...

बहुतो को मिला थोड़ा थोड़ा
फंसा सिर्फ एक मधुकोड़ा


बहुत खूब !!

Rishi said...

bahut hi saral bhasha me bhut gehri baatein kari hai aapne ajay ji....badhaii..!!

Asha said...

beeta kal kyo yad karen ,aane vale kal ko khub sajaye.A nice composition.
asha

Green Group said...

बहुत ही अर्थपूर्ण, तीक्ष्ण , अत्यधिक सुन्दर रचना..

pioneer said...

"ab peeche ki baat bhoolkar hum aage ki soch rahe hain ,attet ki ret me safalta ke padchinhon ko khoj rahe hain" .naye saal par likhi ye rachna behad behatreen hai mujhe abhi devnagri me pratikriya kaise likhani hai ye nahi pata isliye is tarah likha aage devnagri me likhane ka prayaas karunga hindi blog jagat me aapke dwara mere swagat hetu aapne mere blog par jo sandesh likha uske liye main tahe dil se aapka aabhari hoon aasha karta hoon ki vicharon aur bhaavon ka ye pravaah nirantar bahta rahega

Pushpa Bajaj said...

likhte rahie ! prernadayak hai.

Akhtar Khan Akela said...

aadrniy ajay kumar ji aadaab arz he aapkaa blog pdhaa ab bs pdhte rrhne ko ji chaahtaa he. akhtar khan akela kota rajasthan