Sunday, January 6, 2013

--------"वो"---------(अजय की 'गठरी' )


जीवन की आपाधापी में ,कोई मुझसे मिला अनजाना सा |
उसकी आँखें , उसकी वो अदा ,उसका चेहरा पहचाना सा ||

वो थोड़ा सा शरमाया भी
देखा मुझको ,मुस्काया भी
मुस्कान लगा मुझको जैसे
कुछ फूलों का खिल जाना सा ||

आँखों में उसके राज नया
बातों का इक अंदाज नया
आँखों में अपनापन देखा
अंदाज लगा पहचाना सा ||

वो ऐसे ही हर बार मिला
जैसे की , पहली बार मिला
हर बार लगा अनजाना सा
पर आज लगा पहचाना सा ||
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गठरी पर अजय कुमार
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7 comments:

Reena Maurya said...

बहुत ही सुन्दर रचना..
:-)

दिगम्बर नासवा said...

जीवन में नयापन बनाए रखना जरूरी है ... चाहे कोई अंजाना हो या पहचाना ....

डॉ टी एस दराल said...

वो कौन था /थी। :)

सदा said...

वाह ... बेहतरीन

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...



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♥सादर वंदे मातरम् !♥
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वो ऐसे ही हर बार मिला
जैसे की , पहली बार मिला
हर बार लगा अनजाना सा
पर आज लगा पहचाना सा

बहुत सुंदर...
आदरणीय अजय कुमार जी !
ख़ूबसूरत रचना !


हार्दिक मंगलकामनाएं …
लोहड़ी एवं मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर !

राजेन्द्र स्वर्णकार
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Sriram Roy said...

. बहुत उम्दा,सुन्दर प्रस्तुति . हार्दिक आभार आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये ....

tbsingh said...

sunder prastuti