Friday, May 17, 2013

मैंने तुम्हे दिल में क्यों बसाया----- (अजय की गठरी )

              ( ६४ )
मैंने तुम्हे दिल में क्यों बसाया
तुमने --
कभी रुलाया तो कई बार , हंसाया
अनगिनत बार तुम मेरे सुख -दुःख का कारण बने
चाहकर भी मैं तुमसे विमुख नहीं हो सकता
क्यों की हे क्रिकेट तुम नहीं हो गंदे -----
गंदे हैं तुम्हारे चंद नुमाइन्दे----
हम उस दौर में जी रहे हैं
जहां --पैसा ,व्यक्ति और व्यक्तित्व का मूल्यांकन करता है
 पद प्रतिष्ठा ,सम्मान दिलाता है
यही सोच हमें गुनाह के दलदल में ले जाता है
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गठरी पर अजय कुमार
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6 comments:

दिगम्बर नासवा said...

बात तो सही कही है ... पर यदि सभी दलदल तक धंसे हों तो ऐसे में प्यार को क्या करें ...

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

बिल्कुल सही
बहुत बढिया

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) said...

Nice !!

http://www.liveaaryaavart.com/

डॉ टी एस दराल said...

कुछ मछलियों ने ही तालाब गन्दा कर रखा है।

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

अक्सर देखता हूँ कि लोगों के पेट तो भरे होते हैं मगर नीयत नहीं भरती !

Kailash Sharma said...

बिल्कुल सच कहा है...बहुत सुन्दर और सटीक रचना..