अभी अभी गाँव से लौटा हूं , सुखद अनुभूतियों के साथ ।हमारे गाँव के आसपास बागों की बहुतायत है और लगभग ३ कि.मी. पर जंगल है तो वातावरण काफी अच्छा रहता है ।हालांकि गर्मी बहुत थी , फिर भी शाम से मौसम ठीक हो जाता था ,और छत पर सोने का अह्सास सुखद था । हैंडपम्प से नहा कर तो अत्यधिक आनंद आया ।मैनें बेटे को बताया कि ये वातानुकूलित जल है, गर्मी में ठंढ़ा तथा सर्दी में गर्म । शायद उसे
शीतल जल का अर्थ भी समझ में आ गया होगा ।
इस बार आम की फसल कम है । लेकिन ये तो होता ही है ,कि आम एक साल अच्छे आते हैं और दूसरे साल कम । फिर भी पर्याप्त है ।
एक झलक बाग की
खबरदार ,
आम तोड़ना मना है
बेटे ने लिया ताजे आम का स्वाद (इससे ताजे आम मिलेंगे भी नही )
आज तो बस इतना ही ,आगे और भी बातें होंगी ।
हो गया मैं नास्टेल्जिक , आकर के गाँव में ।
ए.सी. डाउन मार्केट हुआ , पीपल के छाँव में ॥