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Tuesday, December 31, 2013

क्या इस साल भी --तुम बदलोगे सिर्फ अपना नाम (अजय की गठरी)

                                (70)

नाम बदलने से --कोई नया हो जाता है ?
करवट बदलने से क्या हो जाता है ?
तुम-- दो हजार तेरह से , दो हजार चौदह हो जाओगे
तो क्या --भय,भूख,भ्रष्टाचार से मुक्त हो जाओगे ?
दल्ले ,देश बेचकर मालामाल हो रहे हैं |
योग्य,पलायन कर रहे हैं--या बदहाल हो रहे हैं ||
दिन प्रतिदिन बढती बेरोजगारी ,नौकरी के लिए मारामारी ||
देश का युवा --गलत रास्ते पर जाने से कैसे बच पायेगा ?
क्या ईमानदारी गूँथ कर ,रोटी पकायेगा ?
लोगों की मरी हुई भावनाओं को जगाओ |
अच्छी सोच और संवेदनाओं को जगाओ ||  
गरीबों की अवस्था को बदलो --सड़ी हुयी व्यवस्था को बदलो ||
क्या इस साल ---
भूख से कोई नहीं मरेगा ?
किसी दबंग से कोई नहीं डरेगा ?
क्या क़ानून कर पायेगा अपना काम ?
या --बीते सालों की तरह
क्या इस साल भी --तुम बदलोगे सिर्फ ,  अपना नाम ||
याद रखो ---जब चाल,चरित्र,और चेहरा बदल कर आओगे |
तभी अलविदा और स्वागत की सलामी हमसे पाओगे ||
यदि ,व्यवस्था नहीं सिर्फ नाम बदल कर आओगे |
तो सिर्फ ---एक और साल बन कर रह जाओगे ||

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आशा और उम्मीद के साथ कि नया वर्ष पुराने से बेहतर हो 
          गठरी पर अजय कुमार
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Thursday, October 24, 2013

‘‘जि़ंदगी कैसी है पहेली..’’---मन्ना डे नहीं रहे (अजय की गठरी )

                                                  (६८)
मन्ना डे के जाने के बाद संगीत के सुनहरे दौर के महान गायकों की आख़िरी कड़ी भी आज बिखर गयी | प्रबोध चन्द्र डे उर्फ मन्ना डे का जन्म एक मई 1920 को कोलकाता में हुआ था।
संशाधन होते हुए भी उसका उपयोग न होना , इसका ज्वलंत उदाहरण थे "मन्ना डे" |संगीत के सुनहरे दौर में भी  नायाब गायक का समुचित इस्तेमाल न होना एक त्रासदी से कम नहीं | फिर भी जो गाने इन्हें मिले वो अमर हो गए |जिस गाने को बड़े से बड़ा गायक छूने की हिम्मत नहीं करते थे , उन गानों के साथ समुचित न्याय मन्ना डे ने किया |हालांकि उनके ऊपर शास्त्रीय संगीत के गायक का ठप्पा लगा दिया गया था ,लेकिन जब भी उन्हें अलग तरह के गाने मिले उन्होंने चार चाँद लगा दिए |उन्होंने हरिवंश राय बच्चन की मशहूर कृति ‘मधुशाला’ को भी आवाज दी|इसके अलावा 'पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई', 'लागा चुनरी में दाग़', 'आयो कहां से घनश्याम' 'सुर न सजे', 'कौन आया मेरे मन के द्वारे', 'ऐ मेरी जोहर-ए-जबीं', 'ये रात भीगी-भीगी', 'ठहर जरा ओ जाने वाले', 'बाबू समझो इशारे', 'कसमे वादे प्यार वफा' जैसे गीत भी काफी पंसद किए गए| फिल्मों में उल्लेखनीय योगदान के लिए वर्ष 1971 में पद्मश्री पुरस्कार और वर्ष 2005 में पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा वह वर्ष 1969 में फिल्म 'मेरे हुजूर' के लिये सर्वश्रेष्ठ पार्श्र्वगायक, 1971 में बंगला फिल्म 'निशि पदमा' के लिये सर्वश्रेष्ठ पार्श्र्वगायक और 1970 में प्रदर्शित फिल्म 'मेरा नाम जोकर' के लिए फिल्मफेयर के सर्वश्रेष्ठ पार्श्र्वगायक पुरस्कार से सम्मानित किये गये। वर्ष 2007 में उन्हें फिल्मों के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने न केवल रागों पर आधारित गीत गाए बल्कि कव्वाली और तेज संगीत वाले गीतों को भी अपनी आवाज से सजाया।मन्ना डे की आवाज कई पीढ़ियों की पसंदीदा रही है और आने वाली पीढ़ियों तक रहेगी |
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                       गठरी पर अजय कुमार
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Friday, May 17, 2013

मैंने तुम्हे दिल में क्यों बसाया----- (अजय की गठरी )

              ( ६४ )
मैंने तुम्हे दिल में क्यों बसाया
तुमने --
कभी रुलाया तो कई बार , हंसाया
अनगिनत बार तुम मेरे सुख -दुःख का कारण बने
चाहकर भी मैं तुमसे विमुख नहीं हो सकता
क्यों की हे क्रिकेट तुम नहीं हो गंदे -----
गंदे हैं तुम्हारे चंद नुमाइन्दे----
हम उस दौर में जी रहे हैं
जहां --पैसा ,व्यक्ति और व्यक्तित्व का मूल्यांकन करता है
 पद प्रतिष्ठा ,सम्मान दिलाता है
यही सोच हमें गुनाह के दलदल में ले जाता है
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गठरी पर अजय कुमार
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Sunday, December 23, 2012

तुम्हें अपना पुरुषत्व गंवाना होगा-----(अजय की गठरी )


किसी की मां , बहन , बेटी ,
किसी का प्यार --लड़की
गर्भ में असुरक्षित
घर में भेदभाव का शिकार --लड़की ||
बेटियों की ह्त्या , गर्भ में की जाती है
भ्रूण-ह्त्या तो अपराध है |
ये हत्यारे कोई सजा नहीं पाते ,
हे व्यवस्था तुझे साधुवाद है -------

एक लड़की इन सबसे बचकर , आगे बढ़ रही थी
दो- चार सीढियां चढ़ रही थी
उसकी इज्जत तार -तार हो गयी
इंसानियत भी शर्मसार हो गयी
ऐसे हादसे पहले भी होते रहे हैं |
कड़ी कार्रवाई का भरोसा देकर
हमारे कर्ता-धर्ता सोते रहे हैं ||

पूरी संसद ,
शासन-प्रशासन के लोग , भावनावों में बह रहे हैं |
कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए
चीख चीख कर कह रहे हैं  ||
मेरी मंद-बुद्धि  एक सवाल करती है
जब सारा अधिकार तुम्हारे पास है  |
सजा देने के लिए क्या किसी और की तलाश है ???
क्यों चीख रहे हो चिल्ला रहे हो ?
किससे तुम्हारा ये , संवाद है ?
हे व्यवस्था तुझे साधुवाद है ---

मां -बहनों का सम्मान करो , इन अधम-पिशाचों को बताना होगा |
म्रत्युदंड नहीं --तुम्हें अपना पुरुषत्व गंवाना होगा ||
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           गठरी पर अजय कुमार
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Sunday, July 17, 2011

जन्मदिन कैसे मनायें ???(अजय की गठरी)

है लहू से लाल धरती ,कैसे कोई गीत गायें ?
मन व्यथित व्याकुल ह्रदय है
जन्मदिन कैसे मनायें ?

जिन पे जिम्मेदारियां हैं ,वो बयानों में हैं उलझे ।
ध्यान मुद्दे से हटा है ,समस्या कैसे ये सुलझे ?
खत्म इनमें भावना है ,मिट गईं संवेदनायें ॥
मन व्यथित व्याकुल ह्रदय है,जन्मदिन कैसे मनायें ?

ये पकड़ में आये भी तो , इनके बाप का क्या जायेगा ?
देश के पैसों से इनका ध्यान रक्खा जायेगा ।
ठाट से जिंदा रहें ये , और हम मातम मनायें ॥
मन व्यथित ,व्याकुल ह्रद्य है ,जन्मदिन कैसे मनायें ?

जहर नफरत का है फैला , तुम नहीं इसमें उलझना ।
धर्म के उन्मादियों से , तुम सदा ही दूर रहना ॥
सफल और खुशहाल जीवन की बहुत शुभकामनायें ॥
प्रेम की गंगा बहायें , दिल किसी का ना दुखायें ।
जन्मदिन ऐसे मनायें,   जन्मदिन ऐसे  मनायें ॥

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विगत १३ जुलाई को मुम्बई में आतंकी घटना हुई ,तमाम जिम्मेदार नेताओं ने गैरजिम्मेदाराना बयान दिये, मीडिया में मुम्बई के स्पिरिट (????) की तारीफ हुई ।
आज १७ जुलाई को मेरे बेटे आयुष का जन्मदिन है , इस समय जो विचार आये ,आपके सामने है ।



हम आयुष के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए ,सर्वशक्तिमान ईश्वर से प्रार्थना करते हैं  कि आने वाली पीढ़ी को सुंदर समाज मिले ।
*******अजय कुमार एवं नलिनी श्रीवास्तव(पापा-मम्मी)*************

Saturday, July 2, 2011

५२-मेरा दिल ले गई है वो-----(अजय की गठरी)

                  -५२-

ये कैसा दौर आया है , हुआ फैशन से कन्फ्युजन ।
जिसे हम नर समझते थे , असल में वो तो मादा है ॥

मुहल्ले की हसीना है , वो जिसकी आज है शादी ।
झूमकर मैने भी नाचा , मगर अफसोस ज्यादा है ॥

ये मेकअप में छुपे चेहरे , मुझे कुछ कुछ नहीं होता ।
मेरा दिल ले गई है वो ,कि जिसका रूप सादा है ॥

सामने पत्नियों के , सारे पतियों की हवा निकली ।
जो खुद को शेर कहता है , वही खरगोश ज्यादा है ॥

कुंवारे थे तो अच्छा था , डिसीजन खुद ही लेता था ।
मेरा घर अब व्यवस्थित है , मगर सरदर्द ज्यादा है ॥

घर में सुख-चैन से रहना , कोई जादू नहीं होता ।
वही सब होते रहने दो , जो पत्नी का इरादा है ॥

लगाई आग इस घर में , इसी घर के कसाबों ने ।
अरे जयचंद को पकड़ो , ये तो बस एक प्यादा है ॥

इलेक्शन का टिकट पक्का है मेरा , कटेगा कैसे ?
गुनाहों से भरा दामन , शराफत का लबादा है ॥

Monday, January 3, 2011

सूचना एवं संचार तकनीक से महरूम रेलवे ??(अजय की गठरी)

सबसे पहले तो आप सभी को नये वर्ष की शुभकामनायें । अभी कुछ दिनों के लिये लखनऊ और सिद्धार्थनगर गया था ,कल शाम को लौटा हूं । गुर्जर आन्दोलन की क्रिपा से हमारी ट्रेन (अवध एक्सप्रेस) सिर्फ ३२ घंटा लेट हुई ।
अब आते हैं असली मुद्दे पर । संचार क्रांति के इस दौर में भी रेलवे अभी भी पूर्ण सूचना देने में बेबस और लाचार दिखने की कोशिश करता है। जरा निम्न बातों पर भी गौर करें-
१-ट्रेन लेट होने की जानकारी टुकड़ों में दी जाती है
२-ट्रेन किस स्टेशन पर है ,वहां क्यों रुकी है नहीं बताया जाता
३-ट्रेन अपने मूल स्टेशन से चल चुकी है या नहीं

 इन बातों के अलावा सेवा की कमी तो हद से बढ़कर है -
१-जनरल के असंख्य टिकट बेचते हैं
२-जनरल के यात्री पैसा देकर टिकट लेते हैं ,फिर पुलिस तथा कुली को पैसा देकर सीट का जुगाड़ करते हैं ,कभी कभी डंडा भी खाते हैं
३-एसी के यात्री पैसा ज्यादा देते हैं लेकिन कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, यदि प्लेन कैंसिल अथवा बहुत लेट हो तो संबंधित एयरलाइंस उनका ख्याल रखने की पूरी कोशिश करते हैं ,रेलवे में ऐसा नहीं है ।
३-हम एसी वेटिंग रूम में थे ,लेकिन उसका टायलेट सार्वजनिक था ,कोई पूछताछ नहीं ।

अब ट्रेन के अंदर की बात -
१-ट्रेन के स्टाफ को ही नहीं पता था कि परिवर्तित रूट क्या है ,अगला स्टेशन कौन सा है ???
२-ट्रेन अचानक क्यों रुकी है
३-क्या ट्रेन में उद्घोषणा नही की जानी चाहिये

और अंत मे मजेदार बात यह है कि रेलवे को तो कुछ नहीं पता था ,लेकिन बहुत से यात्रियों को इनमें से ज्यादातर जानकारी अपने मोबाइल के माध्यम से पता थीं ।
एक बार फिर से आप सब को नये वर्ष में स्वस्थ और सुंदर जीवन की मंगलकामनायें ।
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अजय कुमार
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Saturday, October 2, 2010

बापू क्या ये राज-धर्म है ? (अजय की गठरी )

तन पे लंगोटी ,हाथ में लाठी ।
दुबली पतली सी कद-काठी ॥

गोल गोल आँखों का चश्मा ।
बातों में जादुई करिश्मा ॥

भारत प्रिय था ,प्राण से ज्यादा ।
राम राज लाने का इरादा ॥

देश प्रेम का अलख जगाया ।
अंग्रेजों को मार भगाया ॥

भारत उनकी प्राण-आत्मा ।
इसीलिये कहलाये महात्मा ॥

सत्य अहिंसा के थे पुजारी ।
राष्ट्रपिता को नमन हमारी ॥

हम तो सिर्फ ,निभाते रस्में ।
झूठ में खाते ,आपकी कस्में ॥

रहता है फटेहाल ,स्वदेशी ।
काट रहा है माल , विदेशी ॥

अन्न गोदामों में है सड़ता ।
भूख से मुफलिस रोज ही लड़ता ॥

बापू क्या ये राज-धर्म है ?
भूख से मौतें राष्ट्र शर्म है ॥

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गठरी पर-अजय कुमार
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Sunday, August 22, 2010

क्या आदमी है

मां-बाप के लिये कभी , कुछ ना करे फिर भी ।
मां-बाप की आँखों का , तारा है आदमी ।।

बेटे की जिद के आगे , धृतराष्ट्र झुक गये ।
अपने ही अजीजों से , हारा है आदमी ॥

अपनों का कत्ल करके , बादशाह बन गया ।
मक्कारी में बुलंद सितारा है आदमी ॥

इक दूसरे के खून का , प्यासा कभी कभी ।
इक दूसरे का गम में सहारा है आदमी ॥

बरबाद कभी बाढ़ में , तूफान में कभी ।
कुदरत के आगे कितना , बेचारा है आदमी ॥

गरमी कभी ठंडक कभी ,और जलजला कभी ।
बरसात का , हालात का , मारा है आदमी ॥

फरमाइशें लम्बी हैं , पूरी नहीं होतीं ।
बीबी की नजर में तो , नकारा है आदमी ॥

उनकी नजर में वोट हैं , इंसान नही हैं ।
सियासत में आदमी का , चारा है आदमी ॥

Saturday, July 17, 2010

आज मेरे बेटे का जन्मदिन है,आशीर्वाद दीजिये

आज १७ जुलाई को मेरे सुपुत्र आयुष का जन्मदिन है ।आयुष अभी पांचवी क्लास में पढ़ते हैं ,ड्राइंग और पेंटिग का शौक है ।कागज काट कर कुछ बनाते हैं तो पूरे घर को पता चल जाता है ।पलंग या कुर्सी पर बैठते ही अगर रबर ,पेंसिल आदि चुभ जाय तो हमें पता चल जाता है कि साहब कुछ देर पहले यहीं थे ।



आप सब ब्लाग-परिवार के सदस्यों से निवेदन है कि अपनी शुभ कामना दें।हमारी शुभकामना कविता के माध्यम से-------

               तुम तो हो प्रतिबिम्ब हमारे
               आयुष तुम हो आयुष्मान ।
               सोच सार्थक रखनेवाला 
    बनों नेक दिल का इंसान ॥
                                                 तुम्हारे मम्मी-पापा

अरे!!! इतना छोटा था 
 


नकलची आयुष की एक कोशिश {ऊपर वाले फोटो की नकल )

Sunday, July 11, 2010

अनुत्तरित प्रश्न

इस देश को तब
सोने की चिड़िया कहा गया
जब यहाँ होते थे ,
हरे भरे खेत-खलिहान ।
आज भ्रष्ट और बेइमान लोग
खाते हैं छप्पन भोग
और गरीबों को नसीब नहीं होता
थोड़ा सा जलपान ।
वो कहते हैं कि
देश तेजी से तरक्की कर रहा है
देखते नहीं शेयर मार्केट की उठान ।
पर अनुत्तरित प्रश्न तो ये है
कि
इस विकासशील देश में
भूख और गरीबी से तंग आकर
कब तक आत्महत्या के लिये
विवश होता रहेगा कोई किसान ???

Sunday, May 9, 2010

माँ तूं मुझको याद आती है---

जब कोई चिड़िया गाती है . मुझको नींद नहीं आती है ।
 तेरी  लोरी याद आती है , माँ तूं मुझको याद आती है ॥

दिन भर कुछ करती रहती है , सुबह सुबह तूं उठ जाती है ।
माँ तूं कब सोने जाती है ?
तेरी लोरी याद आती है , माँ तूं मुझको याद आती है ॥

जब बच्चे ऊधम करते हैं , बाबूजी गुस्सा करते हैं ।
बनकर ढ़ाल चली आती है  ।
तेरी लोरी याद आती है , माँ तूं मुझको याद आती है ॥

प्यार से खाना हमें खिलाये , दाल या सब्जी जो बच जाये ।
वही चपाती से खाती है ।
तेरी लोरी याद आती है , माँ तूं मुझको याद आती है ॥

धरा है तूं धारण करती है , स्रिष्टि का तूं कारण बनती है ।
दर्द ,स्नेह से सह जाती है ।
तेरी लोरी याद आती है , माँ तूं मुझको याद आती है ॥

सबसे सुरक्षित माँ का आँचल , माँ सारे प्रश्नों का है हल ।
जीवन पाठ पढ़ा जाती है ।
तेरी लोरी याद आती है , माँ तूं मुझको याद आती है ॥

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संसार की समस्त माताओं को समर्पित

 

Sunday, April 25, 2010

क्या क्या बदल डाला ???

धरती बदल डाला ,अंबर बदल डाला ।
इस तरह हमने रहने का स्तर बदल डाला ॥

मिलकर लड़े अंग्रेजों से ,आपस में अब लड़ें ।
आजादी मिल गई तो कल्चर बदल डाला ॥

तैमूर ,गजनवी ,ब्रिटिश ,तेलगी ,मधु कोड़ा ।
सबने किये हैं वार ,बस नश्तर बदल डाला ॥

मिलने गया सुदामा ,मुलाकात न हुई ।
सुनते हैं कन्हैया ने वो घर बदल डाला ॥

मेरे गरीब दोस्त ने कुछ फोन क्या किये ।
चुपचाप मैंने अपना वो नंबर बदल डाला ॥

पीछे पड़ी थी खाकी तो खादी पहन लिया ।
मेरे इसी कदम ने मंजर बदल डाला ॥

मां-बाप छोटे हो गये जब हैसियत बढ़ी ।
तब कलयुगी सपूत ने वो घर बदल डाला ॥

Monday, March 8, 2010

औरत का सम्मान करो----

औरत का सम्मान करो , औरत संसार की ज्योती है ।
जिसने हम सबको जन्म दिया , वो जननी औरत होती है ॥

जो करती भाईदूज के दिन , भाई के माथे पर टीका ।
राखी के दिन राखी बांधे , वो बहना औरत होती है ॥
औरत का सम्मान करो , औरत संसार की ज्योती है ॥

उसके बिन सभी अधूरा है , घर लगता नहीं है घर जैसा ।
घर का स्वरूप देने वाली , पत्नी भी औरत होती है ॥
औरत का सम्मान करो , औरत संसार की ज्योती है ॥

बच्चा न जने तो अपमानित , बेटी जन्मे तो अपमानित ।
क्या पुरुष का कोई दोष नही , क्यों दोषी औरत होती है ॥
औरत का सम्मान करो , औरत संसार की ज्योती है ॥

जब महिला दिवस मनाते हैं , होती हैं बातें बड़ी बड़ी ।
फिर चिंता किसे कौन देखे , किस हाल में औरत होती है ॥
औरत का सम्मान करो , औरत संसार की ज्योती है ॥

Wednesday, January 27, 2010

हे भाग्य विधाता !!

लोकतंत्र यदि मानव होता ,चीख चीख रोता चिल्लाता ।
अब कितना अपमान सहुंगा ,बतलाओ हे भाग्य विधाता ॥

है स्वतंत्र गणतंत्र राष्ट्र पर , क्या सब जन स्वतंत्र अभी हैं ?
जो निर्धन ,निर्बल, दुर्बल हैं ,वो सारे परतंत्र अभी हैं ॥
जिसके हाथ में मोटी लाठी , भैंस हांक कर वो ले जाता ।
अब कितना अपमान सहुंगा ,बतलाओ हे भाग्य विधाता ॥

मान मिटायें लोकतंत्र का ,हाथ में जिनके संविधान है ।
सदन में हाथापाई करते , अजब गजब विधि का विधान है ॥
किन लोगों को चुना है हमने ,माथा पीट रहा मतदाता ।
अब कितना अपमान सहुंगा ,बतलाओ हे भाग्य विधाता ॥

जो अनाज पैदा करते हैं,कंगले वो सारे किसान हैं ।
करें मुनाफा जमाखोर वो ,जो दलाल हैं बेईमान हैं ॥
पेट सभी का भरनेवाला ,सपरिवार भूखा मर जाता ।
अब कितना अपमान सहुंगा ,बतलाओ हे भाग्य विधाता ॥

सब धर्मों का आदर करिये ,कहता अपना संविधान है ।
घ्रिणित सोच एम.एफ.हुसेन की ,फिर भी उसका बड़ा मान है ॥
कला के नाम पे करे नंगई , हिंदू मुस्लिम को लड़वाता ।
अब कितना अपमान सहुंगा ,बतलाओ हे भाग्य विधाता ॥

Thursday, January 7, 2010

गये साल का तराना

तुमको कुछ बात बताना था
इस दिल का हाल सुनाना था
क्या क्या गुजरी बतलाना था
तुम चले गये तुम्हे जाना था ।

कभी सफल रहे , कभी विफल रहे
कभी दहल गये , कभी अटल रहे
क्या क्या झेला बतलाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था

खेतों में हरियाली होगी
अब देश में खुशहाली होगी
यूं ही दिल को बहलाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था

दिखता नही विकास कैसा
निकला और चला गया पैसा
जिस जेब में उसको जाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था

बहुतों को मिला थोड़ा थोड़ा
फंस गया अकेला मधु कोड़ा
इसका पर्दा सरकाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था

क्यों जिंदा हैं अफजल , कसाब
कब होगा जख्मों का हिसाब
उन घावों को सहलाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था

कुछ खट्टी सी कुछ मीठी सी
कुछ कड़वी सी कुछ तीखी सी
जीवन का स्वाद चखाना था ।
तुम चले गये तुम्हे जाना था

Thursday, December 31, 2009

नया तराना नये साल का

उम्मीदों भरा क्या नया साल होगा ?
हर देशवासी क्या खुशहाल होगा ?

सभी को सुबह शाम रोटी मिलेगी
या मंहगाई का फिर महाजाल होगा ?

क्या अपराधियों की भी आयेगी शामत
या फिर पहुंच का उन्हें ढ़ाल होगा ?

करेगा दलाली वो काटेगा चाँदी
जो खेती करेगा क्या बदहाल होगा ?

मेरे देशवासी क्या सोयेंगे भूखे
कसाबों की थाली में तरमाल होगा ?

समझ लो नया साल अच्छा ही होगा
अब क्या इससे ज्यादा बुरा हाल होगा ?

Saturday, December 19, 2009

एहसास

रात भर हम तो करवट बदलते रहे
दिल के अरमान अश्कों में ढ़लते रहे ।

फूल घायल करेंगे नहीं इल्म था
हम तो कांटों से बच के निकलते रहे ।

धूप में पांव जल न जायें कहीं
घनी अमराइयों में ही चलते रहे ।

बात करनी बहुत थी ,मगर जब मिले
शब्द निकले नही होंठ हिलते रहे ।

मुझपे गैरों का हर वार खाली गया
मेरे अपने मुझे रोज छलते रहे ।

जब दुआ मांगना तो यही मांगना
सबके चूल्हे सुबह शाम जलते रहे ।

राज उनकी तरक्की का इतना सा है
रोज चेहरे पे चेहरे बदलते रहे ।

जब कमाने लगा तो अलग हो गया
बूढ़े माता पिता हाथ मलते रहे ।

Monday, November 23, 2009

जिंदगी

आज ठुमरी वाले विमलजी का जन्मदिन है , उनके दीर्घायु होने की कामना करते हुये ,आज की रचना उनको समर्पित करता हूं-


देखा है जिंदगी को कुछ कुछ करीब से ।
एहसास इस सफर में हुए हैं अजीब से ॥

रहता है मेरे दिल में ही, जिसने दिया है गम ।
शिकवा करुंगा कैसे मैं ,इतने अज़ीज से ॥

देता है कौन साथ यहां ,किसका उम्र भर ।
हम आप मिल गये हैं ,कुछ अच्छे नसीब से ॥

दो वक्त की रोटी मिलेगी ,रहने को घर भी ।
नेताजी कर रहे हैं ,दिल्लगी गरीब से ॥

मुल्ला कहीं पंडित कहीं और पादरी कहीं ।
कैसे बचेंगे लोग  ,मजहबी सलीब से ॥

Sunday, October 4, 2009

प्रेम-डगर

है ये लंबा सफर ,चलना है उम्र भर |
हंसके रस्ता कटे ,प्यार की बात कर ||
लोग मतलब की अब बात करने लगे |
लोग अपने पड़ोसी से डरने लगे ||
ऐसा माहौल हमको बनाना है अब |
खुशियाँ जाने न पायें शहर छोड़ कर ||
कृष्ण , ईशा ने , नानक ने , इक बात की |
सबने सम्मान की , हर इक जात की ||
सबके तालीम में , एक ही बात थी |
रास्ते हैं कई , एक मंजिल मगर ||
जब गुनहगार बस एक इंसान हो |
सारा मजहब ही क्यों उसका बदनाम हो ?
मत बनाओ , ऐसे इबादत के घर |
जो बन जाते हैं , सियासत के घर ||