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Thursday, July 17, 2014

पुत्र "आयुष" का जन्मदिन ---एक पैगाम ,किशोर वय बच्चों के नाम (अजय की गठरी )

                         ( 73 )
कुछ लोग बड़े ---होते हैं ,कुछ लोग बड़े --हो जाते हैं
कुछ लोग बड़े --बना दिये जाते हैं ,कुछ लोग बड़े --बताये जाते हैं 


कुछ लोगों को ---बड़ा दिखने का, होता है मानसिक रोग |
अपने आस-पास रखते हैं , छोटे लोग ||
अपने से बड़ों को , करते हैं नापसंद |
क्षुद्र मानसिकता वालों के साथ ,रहते हैं एक दायरे में बंद ||
ऐसा करना उनकी मजबूरी है|

बड़े हों न हों ------,दिखना जरूरी है ||
क्योंकि ---जो जैसा दिखता है ,वैसा माना जाता है |
इस दौर का व्यक्ति
आतंरिक नहीं --बाह्य व्यक्तित्व से पहचाना जाता है ||


बेटे --हम कलयुग में निवास करते हैं  |
लोग दूसरों की खबरें अपने पास रखते हैं ||
अक्सर दूसरों के प्रगति-पथ पर खड़े हो जाते हैं |
किसी को नीचा दिखाकर ,क्षण भर को ,बड़े हो जाते हैं ||
ऐसे लोग ----,बड़े जरूर दिखाई पड़ते हैं |
लेकिन , ये --अपनी अंतरात्मा से रोज लड़ते हैं || 


बेटे --अब तुम बड़े हो रहे हो
अच्छा लगेगा ,तुम्हारा बड़े  हो जाना |
कितने भी बड़े हो जाओ ---
वक्त पर अपनो के साथ ,जरूर खड़े हो जाना || 

सुख के अलावा ,दुःख में भी साथ निभाओगे |
तुम वास्तव में --बड़े हो जाओगे ||

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                गठरी पर अजय कुमार
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Thursday, November 26, 2009

विचलित मन

अब अपने नन्हें-बच्चों को पाठ विनम्रता का न पढ़ाना !
आने वाले कल की ख़ातिर सत्य -अहिंसा नहीं सिखाना !!

जब नेता हों चोर -उचक्के ऐसे मंज़र रोज़ ही होंगे,
अपनों में गद्दार छुपे हों दिल पर खंज़र रोज़ ही होंगे !
रोज़ ही होगा देश में मातम,ख़ूँ के समन्दर रोज़ ही होंगे
खूँन के मंजर जब दिख जाएं, आँख हाथ से नहीं दबाना !!

आने वाले कल की खा़तिर सत्य - अहिंसा नहीं सिखाना

झूठ बोलना,फूट डालना,जगह जगह दंगे करवाना !
उसे पढ़ाना पाठ घृणा का ,सिखलाना नफ़रत फ़ैलाना !!
सिखलाना कटु शब्द बोलना ,मजहब की दीवार बनाना !
नहीं प्यार की थपकी देना,लोरी गाकर नहीं सुलाना !!

आने वाले कल की खा़तिर सत्य - अहिंसा नहीं सिखाना

कर डाले जो देश का सौदा,ऐसा सौदेबाज़ बनाना !
धर्म की ख़ातिर कत्ल करा दे,धर्म का धंधेबाज़ बनाना !!
उसका कोमल ह्रदय कुचलकर,पत्थर दिल यमराज बनाना !
चोट लगे तो रोने देना , गोद में लेकर मत बहलाना  !!

आने वाले कल की खा़तिर सत्य अहिंसा नहीं सिखाना

ना भागे तितली के पीछे, किसी पार्क में नहीं घुमाना !
नहीं खेलने जाने देना ,उसे खिलौने नहीं दिलाना !!
मीठी बातें कभी न करना, परीकथाएं नहीं सुनाना !
लाकर मत गुब्बारे देना , हाथी बनकर नहीं घुमाना !!

आने वाले कल की ख़ातिर सत्य अहिंसा नहीं सिखाना



आजकल के आतंकी माहौल, नाकाम शासन, प्रशासन और घटिया राजनीति ने ऐसा कहने पर विवश कर दिया । लेकिन इसके लिये मैं बुजुर्गों, अभिभावकों और बच्चों से माफ़ी मांगता हूं।
ये रचना पिछले साल मुम्बई हमले के तुरंत बाद की है , जिसे मेरे मित्र विमल वर्मा ने अपने ब्लाग ठुमरी पर ०४.१२.०८ को पोस्ट किया था ।

Saturday, November 14, 2009

बाल दिवस

जिनका बाल दिवस होता ,कैसे बच्चे होते हैं ?
खाने के ढाबे पर अब भी ,बरतन बच्चे धोते हैं ||
भूख ,गरीबी ,लाचारी में ,जीवन इनका बीत रहा |
जाने कितने नौनिहाल बस पेट पकड़कर सोते हैं ||
खेलकूद ,शैतानी करना ,जिद करना तो भूल गए |
इनको पता चलेगा कैसे ,अक्षर कैसे होते हैं ?
महाशक्ति बनकर उभरेगा ,कैसे कोई देश भला |
भूख ,अशिक्षा ,बीमारी में जिसके बच्चे होते हैं ???